गाड़ी बुला रही है… सीटी बजा रही है… चलना ही ज़िंदगी है…
उसी गीत पर फिल्माया दृश्य आज सच जैसा लगता है।
धरम पाजी आज उस अंतिम गाड़ी में सवार हो गए
जिससे कोई वापस नहीं आता।
तीन पीढ़ियों के दिलों में बसने वाले
हिंदी सिनेमा के अमर नायक धर्मेंद्र को भावभीनी श्रद्धांजलि।
60 के दशक में जब दिलीप कुमार, राज कपूर और देव आनंद की तिकड़ी का जलवा था,
अशोक कुमार और “जुबली कुमार” राजेंद्र कुमार का दौर था—
उसी समय एक नया चेहरा आया—धर्मेंद्र।
पहली फ़िल्म ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ फ्लॉप रही,
पर उनकी उड़ान यहीं से शुरू हुई।
नायिका प्रधान फिल्मों में अनपढ़, बंदिनी, अनुपमा, काजल, ममता जैसी भूमिकाएँ कीं,
लेकिन ‘हीरो’ का तमगा अभी बाकी था।
राजेंद्र कुमार ने साथ दिया—
पहले ‘आई मिलन की बेला’ में विलेन का रोल दिलाया,
फिर ‘फूल और पत्थर’ में मौका दिया—
और यहीं से जन्म हुआ ही-मैन धर्मेंद्र का।
साडे पंजाब दा पुत्तर दुनिया के दिलों पर छा गया।
इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा—
250 से अधिक फिल्मों में रोमांस, एक्शन, ड्रामा और कॉमेडी—
हर जॉनर के बादशाह बनकर उभरे।
शोले, चुपके चुपके, जुगनू, धर्मवीर, आंखें, राजा जानी, मेरा गाँव मेरा देश, प्रतिज्ञा, सीता और गीता,
और हृषिकेश मुखर्जी की क्लासिक ‘सत्यकाम’ —
उनकी विरासत आज भी अमर है।
व्यक्तिगत जीवन
पहली शादी 19 वर्ष की उम्र में, दूसरी शादी 1980 में हेमा मालिनी से—
दोनों परिवार सम्मान और आदर के साथ साथ चले।
सनी और बॉबी देओल—आज भी पिता को सर्वोच्च सम्मान देते हैं।
भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया।
1970 में दुनिया के सबसे हैंडसम पुरुष घोषित हुए।
1997 में जब फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड मिला,
उन्होंने शर्त रखी—अवॉर्ड दिलीप कुमार ही देंगे।
और दिलीप साहब ने मंच पर कहा—
“मैं खुदा से शिकायत करूंगा कि मुझे धर्मेंद्र जैसा हैंडसम क्यों नहीं बनाया।”
पर्दे पर सख्त—
दिल से बेहद नरम, भावुक और इंसानियत से भरे हुए—
यही थे हमारे धरम पाजी।
भावभीनी श्रद्धांजलि।
शत-शत नमन।
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