गंगा नदी की सफाई का पुण्य मध्यप्रदेश के हिस्से में आते-आते रह गया। शासन की उदासीनता और फंड के अभाव प्रोजेक्ट बंद कर दिया गया। असल में भिण्ड चम्बल नदी के किनारे वन विभाग ने पाँच साल पहले विलुप्त प्रजाति के मांसभक्षी कछुओ के संरक्षण का प्रोजेक्ट तैयार किया था। इन कछुओं की पैदावार बढ़ाकर गंगा नदी में भेजा जाना था। यह कछुआ गंगा नदी में सफाई की अहम भूमिका निभाते है।लेकिन यह प्रोजेक्ट शुरू होने से पहले ही बंद हो गया।पिछले साल यहाँ कछुआ के बच्चे मरना शुरू हो गए। इसके बाद अफसरों ने अपने हाथ खड़े कर दिए।आखिरकार अंत में यह प्रोजेक्ट खत्म हो गया।
दरअसल चम्बल नदी के किनारे बरही गांव पर 2016-17 में चम्बल नदी में विलुप्त होती कछुए की मांसभक्षी प्रजाति के संरक्षण के लिए योजना तैयार की गई थी।इस पर करीब डेढ़ करोड़ खर्च होना था।वन विभाग के अफसरों के मुताबिक करीब 70 लाख स्वीकर स्वीकृत होकर आए।इसके बाद यह राशि को कछुए के अंडे रखने। प्रजनन हैचरी बनाएं जाने।ऑफिस बिल्डिंग व आवास आदि पर खर्च किया गया।इसके बाद राशि शासन को नही भेजी गई। यहाँ चार अलग-अलग हैचरी तैयार की गई थी। इन हैचरी में चम्बल की रेत और पानी के टैंक बनाकर नदी जैसा नेचर दिया गया था। इसके बाद यहां करीब 600 संख्या में कछुए के अंडे लेकर रखे गए। इसके बाद 2019-20 में बड़ी तादात में कछुओ के बच्चो की मौत होने लगी। सूत्र बताते है। कि नदी में पाए जाने बाले मृत जीवों जैसे भोजन व्यवस्था नही की जा सकी। इधर शासन की तरफ से राशि रोके जाने के बाद यह प्रोजेक्ट खटाई में चला गया। वन अफसर बचे हुए करीब 271 कछुए और उनके अंडे लेकर मुरैना के देवरी सेंचुरी चले गए। उन्होंने इन्हें चम्बल नदी में विचरण के लिए छोड़ दिया। जिससे यह प्रोजेक्ट पूरी तरह से फैल हो गया और मध्यप्रदेश को गंगा की सफाई का पूर्ण छिन गया।
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